Beyond The Second Sex : स्त्रीविमर्श
पुरुष विमर्श - २
26/05 /2008 से प्रारम्भ हुए पाक्षिक `एकालाप ' स्तम्भ के २००९ - नवम्बर ( प्रथम ) अंक में पुरुष-विमर्श शीर्षक से प्रकाशित कविता के क्रम में इस बार प्रस्तुत है उसका दूसरा भाग -
पुरुष विमर्श - २ ऋषभदेव शर्मा
ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद
सपनों पर पहरे बिठलाए |
भाई! तेरा भी धन्यवाद
त
औरतों के नाम
औरतों के नाम
कविता वाचक्नवी
कभी पूरी नींद तक भी
न सोने वाली औरतो !
मेरे पास आओ,
दर्पण है मेरे पास
जो दिखाता है
कि अक्सर
फिर भी
औरतों की आँखें
खूबसूरत होती क्यों हैं,
चीखों-चिल्लाहटों भरे
बंद मुँह भी
कैसे मुसका लेते हैं इतना
ये दो भारतों के बीच के तीसरे भारत की लड
वह कहीं भी हो सकती है!
यह कहानी शुरू होती है
गुज़री सदी के आखि़री हिस्से से
जब निराला की प्रिया
किसी अतीत की वासिनी हो गई थी
और प्रसाद की नायिकाएँ
अपनी उदात्तता, भव्यता, करुणा और विडंबना में
किसी सुदूर विगत और
किसी बहुत दूर के भविष्य का स्वप्न बन गई थीं
अब यहाँ थी
एक लड़
पुरुष विमर्श
एकालाप
पुरुष विमर्श
ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद
नन्हें हाथों में कलम धरी.
भाई! तेरा भी धन्यवाद
आगे आगे हर बाट करी.
तुम साथ रहे हर संगर में
मेरे प्रिय! तेरा धन्यवाद;
बेटे! तेरा अति धन्यवाद
हर शाम दिवस की थकन हरी.
शिव बिना शक्ति कब पूरी है
शिव का भी शक्ति सहारा है.
मेरे भी
जाति की जड़ों को काटतीं औरतें
जाति की जड़ों को काटतीं औरतें
- शिरीष खरेउस्मानाबाद से, 28-Oct-09
देश में कुल आबादी का एक-चौथाई हिस्सा दलितों और आदिवासियों का है। मगर उनके पास खेतीलायक जमीन का महज 17.9 प्रतिशत हिस्सा है। इसी तरह कुल आबादी में करीब आधी हिस्सेदारी औरतों की है। जो कुल मेहन
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